इंतिज़ार में वक़्त के ज़ाए का
अफ़सोस रह जाता है,
वक़्त बीत जाने पर
अपने लिए वक़्त बचा न सकने का
अफ़सोस रह जाता है,
आँखों को नींद का धोखा मिले तो
रात बीत जाने का
अफ़सोस रह जाता है,
तट पर पहुँचते ही दूर जा चुकी नय्या को देख
जल्दी न पहुँचने का
अफ़सोस रह जाता है,
कमज़ोरी है जीवन भर
ज़ात और मज़हब के लबादे में लिपटे रहना
मनुष्य को मनुष्य न होने का
अफ़सोस रह जाता है,
इंसाँ है इंसाँ न हो के कुछ और होने का
अफ़सोस रह जाता है।
और जब अफ़सोस का कोई अर्थ नहीं रह जाता
तब भी हमारे दाएरे से बाहर की
दुनिया का अफ़सोस रह जाता है।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।


