चार मुक्तक - कामिनी मोहन।


1.

हमने जो भी चाहा कब  मिला  है  हमें,

सदा  ही  ख़ाली  कोना  मिला  है  हमें।

हर  नए दर्द की  हैं  एक  नई  दास्तान

दो पन्नों के बीच सन्नाटा  मिला  है हमें।


2.

जीवन  भर  रेत  को  मुट्ठी  में  पकड़ा  हमने,

हवा  के  रुख़  को  कब  तन्हा  छोड़ा  हमने।

इतना भी न समझे न ठहरेगी, निकल जाएगी

जाती  हुई  साँसों  को   कब   पकड़ा   हमने।


3.

ऐ   ज़िंदगी,  सपनों   को   संजोते    किधर    जाएगी,

बदलती  दुनिया  में  आँख  खुलते ही  बिखर  जाएगी।

हिम्मत को बनाए रखने की हिम्मत रखे कोई कब तक,

मंजिल पर पहुँचकर एक  और  मंजिल  नज़र आएगी।


4.

पंचतत्व का शरीर ये मेरा नहीं मानता हूँ

अनगिनत चेहरों में एक है रूह मानता हूँ

उस एक को पाने को चल पड़े हैं राहगीर

फ़ितरत ने दिए  पाँव  में  छाले  मानता हूँ


- © कामिनी मोहन पाण्डेय।