कोई भी हलचल तब मालूम होती है
जब उसमें तेज़ी आ चुकी होती है।

सावन के सोमवार का दिन है
मैं वाराणसी के प्लेटफ़ार्म पर खड़ा हूँ
वहाँ हज़ारों लोग अपने-अपने गंतव्य को
जाने को जमा है।

बाबा विश्वेश्वरनाथ को
जल अर्पित करने के लिए कांवड़ उठाए
गेरुआ रंग के वस्त्र में स्वयं को लपेटे
शिव भक्तों के बम-बम में तेज़ी आ चुकी हैं।

वाक़ई काशी बम-बम बोलता है
और स्वर में स्वर घोलता है।

सावन की फुहारें बौछार में बदल चुकी हैं।
तेज़ हवा का झोंका लिए ट्रेन आती और जाती है
प्लेटफ़ार्म पर छाई टीनों पर वर्षा की बौछारें
बम-बम के साथ गुनगुनाती हैं।

लगता जैसे यह संपूर्ण मानवीय विचारों को
उलटता-पलटता, तोड़-फ़ोड़ करता बल है
सब स्वच्छ करता वर्षा का जल है।

शिव का अभिषेक प्रकृति के साथ-साथ
जोश में आए हज़ारों शिव भक्तों का
जोशीला कंठस्वर एकाग्र व एकीकृत पर चंचल है।

ये पंचतत्व है
या कि आत्म तत्व
या कि...?

याकि सत् रज् तम्
देह भीतर पिरोने वाले
कम या कि ज़्यादा फीसदी में
बाँटने वाले शिव परम ईश्वर है।

सब चल रहे है क्योंकि
है उसके पास कोई गणित का सूत्र
जिस कारण सब मनुष्य अलग-अलग है
शायद शून्य-एक-शून्य का है बाइनरी ऑपरेशन।

इस कोडिंग की प्राप्ति के लिए
पिछले जन्म में
मैंने शिव से कोई फ़रमाइश
की है या कि नहीं याद नहीं।

इस जन्म में
सिर्फ़ मनुष्य की तरह
मनुष्य में व्याप्त मनुष्यता की कविता ही पानी चाही।
उसके लिए
निशान ढूँढ़ती हैं नज़रे मेरी
आवाज़ें ख्वाहिशों की सुनती है
प्रेम और प्यास के अंतर्तम सम्बन्ध को
आते-जाते लोगों में देखती है।

हे सावन! नीले आसमान से
शफ़्फ़ाफ़ जल-भरे अंधड़ लिए
शिव की जटाओं से बिखरों
देह-गेह में शामिल तत्वों पर
नेह बन एक-सम बरसो।

है धरा पर जब तक मनुष्य
लौकिक है।
क्योंकि
मनुष्य की पहली और आख़िरी अनुभूति है देह की
जीवन भर चलते रहने पर रुकने का ख़याल न करने की
यात्रा पूरी होने पर स्टेशन परिसर से बाहर निकल जाने के आदत की।

शक्ति के क्षीण होने पर
थक कर बैठता हूँ
जानता हूँ
एक दिन शक्ति के देह छोड़कर चले जाने पर
शव बनकर रह जाऊँगा
फिर देह की यात्रा में शामिल होने को
किसी स्टेशन पर नहीं आऊँगा।
बम-बम की एक भी बूँद को
अपनी देह समाहित नहीं कर पाऊँगा।

लौकिक और पारलौकिक की कड़ी देह है
पाँव तीर्थ पार के लिए संघर्ष करते हैं
बस अविराम चलते रहते हैं
ज़ख़्मी पाँव की छाप
मिट्टी पर होगी
बादल घिरेंगे और बारिश होगी
पर उससे हमारा स्पर्श न होगा
अंतिम अभिषेक जल से नहीं
भस्म से होगा।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।