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" अंतिम अभिषेक " - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan July 26, 2022
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कोई भी हलचल तब मालूम होती है
जब उसमें तेज़ी आ चुकी होती है।

सावन के सोमवार का दिन है
मैं वाराणसी के प्लेटफ़ार्म पर खड़ा हूँ
वहाँ हज़ारों लोग अपने-अपने गंतव्य को
जाने को जमा है।

बाबा विश्वेश्वरनाथ को
जल अर्पित करने के लिए कांवड़ उठाए
गेरुआ रंग के वस्त्र में स्वयं को लपेटे
शिव भक्तों के बम-बम में तेज़ी आ चुकी हैं।

वाक़ई काशी बम-बम बोलता है
और स्वर में स्वर घोलता है।

सावन की फुहारें बौछार में बदल चुकी हैं।
तेज़ हवा का झोंका लिए ट्रेन आती और जाती है
प्लेटफ़ार्म पर छाई टीनों पर वर्षा की बौछारें
बम-बम के साथ गुनगुनाती हैं।

लगता जैसे यह संपूर्ण मानवीय विचारों को
उलटता-पलटता, तोड़-फ़ोड़ करता बल है
सब स्वच्छ करता वर्षा का जल है।

शिव का अभिषेक प्रकृति के साथ-साथ
जोश में आए हज़ारों शिव भक्तों का
जोशीला कंठस्वर एकाग्र व एकीकृत पर चंचल है।

ये पंचतत्व है
या कि आत्म तत्व
या कि...?

याकि सत् रज् तम्
देह भीतर पिरोने वाले
कम या कि ज़्यादा फीसदी में
बाँटने वाले शिव परम ईश्वर है।

सब चल रहे है क्योंकि
है उसके पास कोई गणित का सूत्र
जिस कारण सब मनुष्य अलग-अलग है
शायद शून्य-एक-शून्य का है बाइनरी ऑपरेशन।

इस कोडिंग की प्राप्ति के लिए
पिछले जन्म में
मैंने शिव से कोई फ़रमाइश
की है या कि नहीं याद नहीं।

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