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244.ताकि ख़ुद से परे - कामिनी मोहन।

इस संसार में
इच्छा के संबंध में
पक्षपात और लोभ के प्रबंध में
आनंद और नाराज़गी के द्वंद्व में
क्रोध, झूठ और संदेह के जन्म में
सब कुछ है अभिप्रेत
तो फिर दुश्मन कौन है।

सत्य जो मुक्त है
जिनसे आकाशीय प्रतिबिंब निखरते हैं
कभी न खत्म होने वाले घेरे में
हमको घेर रहते हैं
गहराईं है मनोगत या कुछ और
अंतहीन पुनर्जन्म की पीड़ा में
आशाओं के अलग हुए बादल गिनते हैं।

यह कठिन है तो
फिर बहुत आसान क्या है
ज्ञान, ज्ञान और दूरदर्शिता का प्रवाह
या अवचेतन में
पानी की बूँदों का संघनित निर्वाह
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