191.बाज़ुओं के ज़ोर की पहचान
- कामिनी मोहन।'s image
Poetry1 min read

191.बाज़ुओं के ज़ोर की पहचान - कामिनी मोहन।

Kamini MohanKamini Mohan November 8, 2022
Share0 Bookmarks 61104 Reads2 Likes
मौन की माला फिरती नहीं
भाव उभरकर बिखरती नहीं।
तपती दुपहरी में फूल सूख भी जाए
शब्दों की टोकरी कभी सूखती नहीं।

कठोर पाषाण जैसे
शब्दों से
शब्दों के गूँजते अर्थों से
है संवाद बस इतना,
हैं सामने उपस्थित सवाल जितना।
साधना-आराधना
पूर्णता-अपूर्णता के सवालों से
है उलझना उतना,
जवाब का है सुलझना जितना।

रोका गया,
टोका गया,
सिर पर आज़ादी का तमग़ा
ठोका गया।

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts