अंधेरे कोने में आँखों को विस्फारित कर
अधजली चिन्ताएँ कुरेदते जाते हैं
बार-बार अनदेखा देखते हैं
देख लेने के बाद गहरी साँस लेकर
फिर नए को देखने की कोशिश करते हैं।
तड़प, पीड़ा, दुख को
शिथिल अंगों से ढोते हैं
किसी दूसरी दुनिया में जहाँ
कोई द्वंद्व न हो वहाँ
जीते जी संभव न सही
मरने के बाद का दृश्य बुनकर
वापस हो लेते हैं।
जन्म और मरण के अंतराल में
कविता की तड़प को सहते हुए
बेख़ौफ़ शब्दों की ध्वनि के टूटते हुए
बीत रहे वक़्त की चादर के
छोटे होते जाने तक
आत्म के स्वरुप चुपचाप रहते हैं।
लेकिन रोज़-रोज़ बदलती हैं
चेहरे की झुर्रियाँ,
सिलवटे हैं या हैं आकृतियाँ
वक़्त की चादर पर पड़ी
अकारण स्मृतियाँ।
भूलभुलैया-सी भूल है
या तटस्थ रहने का नि:शेष मूल है।
या फिर अपना ही बीता हुआ चेहरा है
जिसका धंसा हुआ अशेष शूल है।
- © कामिनी मोहन पाण्डेय।
शब्दार्थ:
नि:शेष : जिसमें कुछ भी बाकी न बचा हो।
अशेष : सम्पूर्ण


