हम, कितनी ही होलियां जला लें।   हम, कितना ही रावण को जला लें।   हम, कितने ही त्यौहार मना लें।   हम, कितने ही अभियान चला लें।   कुछ भी, होता नहीं बिशेष है।   क्योंकि अभी, खुद को बदलना शेष है।