(हमारी स्वछन्द स्वतंत्रता अर्थात हमारे पहले जैसे सुनहरे भारत का आहवान)

 

ये भारत फिर सुनहरा हो

 

समंदर कितना गहरा है

मगर उसपे भी पहरा है

खुला है आसमां लेकिन

अजब उसका भी चेहरा है

छुपे हैं हम घरों में यूं

कयामत सर पे सेहरा

मेरे मालिक ये बता दे

कहां भारत सुनहरा है।।

 

गूजती थी वादियों में

के जां में जां बसती थी

सुहानी थीं फिजाएं भी

अलग अपनी ये हसती थी

भोले-भाले से लोगों का

क्यों बदला आज चेहरा है

मेरे मालिक ये बता दे

कहां भारत सुनहरा है।।

 

गुजारिश है मेरी तुझसे

मुझे कुछ तो भरोसा दे

तेरे होने का पहला सा

मुझे कुछ तो संदेशा दे

डरें अपराध करने से

उन्हें कुछ तो अंदेशा दे

मिटा दे पाप दुनिया से

तेरे सर पे ही सेहरा हो

मेरे मालिक करम कर दे

ये भारत फिर सुनहरा हो।।