(घर, परिवार, समाज, देश की एकता-अखण्डता के लिए कविता)

एकता

 

मोहब्बत की नजर से तो, कड़े पत्थर पिघल जायें

चलें महादेव की राह पर, जहर दिल का निगल जायें।।

 

के रिश्ते और नातों का, सिला तो यूं ही चलता है

बदलते हम नहीं यारों, ये रिश्ता रंग बदलता है।।

 

खफा है अपने अपनों से, चलो सबको ये समझाएं

मिटा के दूरियां दिल की, दिलों से फिर से अपनाएं।।

 

तेरा हर राबता मुझसे, मेरा हर राबता तुझसे

चुभन सी दिल में लेकर, तू क्यों रस्ता बदलता है।।

 

पहले घर को संभाले हम, देश आप ही संभल जाए

मोहब्बत की दलीलों से, पड़ोसी भी बदल जायें।।

 

चले जो तीर इस दिल पर, वहीं तुझमें भी चलता है

मिटाने दूरियां दिल की, हमारा दिल मचलता है।।

 

नफरतों से ही तो यारों, चलो अब पार पा जाएं

करें फिर प्यार बचपन सा, तुम्हारा प्यार पा जाएं।।

 

मेरे आहवान करने का भी, हक इतना तो बनता है

एक हो जायें सब यारों, ये भारत की जो जनता है।।