उनके लिए रिश्ते ही मर चुके हैं इस बुरे वक्त में।
वो जिनके लिए पेशा हैं इश्क-ए-कोरोना।
वो जियें भ्रम तोड़ के, के उन्हें नहीं देख रहा कोई
वो जिनके लिए पेशा हैं इश्क-ए-कोरोना ।
उन्हे लोग ईश्वर अल्लाह जीसस वाहे गुरू कह रहे हैं।
और वो पेशा-ए-इश्क-ए-कोरोना कर रहे हैं।
जिन हाथों पर किया था भरोसा उन्हे भगवान समझकर,
उन हाथों ने इसे पेशा बना लिया।।
सँभंल जाओ वरना आज किसी की बारी हैं, कल तुम्हारी हैं।
ये कामयाबी वो कामयाबी सब धरी रह जायेगी।
जब चलेगी लाठी उसकी बिना आवाज़ की।।
कमल पुंडी़र।।


