आहिस्ता आहिस्ता चल अभी ए फ़लक के चाँद
रफ्ता रफ्ता अभी गज़ल की जुल्फें संवार रहा हूँ मैं
अभी लम्हा लम्हा जर्रा जर्रा बिखर रहा है फूल मेरा
अभी का़श का़श जिंदगी सा सिमट रहा हूँ मैं
गुमाँ गुमाँ सी खुशबू हर सम्त चहक रही है उसकी
सहमा सहमा सा अभी तलक भटक रहा हूँ मैं
...कमल पुंडी़र


