रेत ही रेत थी पानी ही पानी था चारो तरफ

मैं तैरकर पार ना करता तो क्या करता


तूने मेरी वफा़ओ का सिला ही कुछ ऐसा दिया

मैं दिल को नासूर ना बनाता तो क्या करता


मुझे पसंद नही हैं इधर उधर की बातें जो लोग करते हैं

मैं बज़्म छोड़कर नही जाता तो क्या करता


....कमल पुंडी़र