काँटे ही काँटे हैं दामन में मेरे मगर,
बिन पानी तपती रेत पर फूल खिलाता हूँ।
मेरी सुंदरता के यूँ तो कायल हैं सभी पर,
ना जाने फिर भी क्यूँ मुझसे कतराते हैं।
मैं ही हूँ जो पानी की हरेक बूँद बचाता हूँ
सबको जल ही जीवन हैं, का पाठ पढा़ता हूँ।...
..कमल पुंडी़र
