बेजुबां परिंदों को क्यूँ तुम सताते हो

गीत तुम गाते हो, गज़ल वो भी तो गुनगुनाते हैं


याद में गर तुम आँखें नम करते हो

ये परिंदे भी तो अश्रु बहाते हैं


जिंदगी गर तुम जीते हो

सफर ये परिंदें भी तो रुह तक करते हैं


शाम ढ़ले गर तुम घर को लौट आते हो

ये परिंदें भी तो घोंसले में लौट आते हैंं


...कमल पुंडी़र