आज फिर मेरे आँगंन का फूल मुरझाया हैं। 

आज फिर मैं भँवरें तितलियाँ लेकर आया हूँ।    


आज फिर मैंने दर क्या खुला छोड़ दिया।      

आज फिर मेरे आँगंन में एक घायल परिंदा आ गया।


आज फिर मेरी बस्ती में अंधेरा छाया हैं।               

आज फिर मैं जूगनू लेकर आया हूँ।


आज फिर मैं सींप लेके आया हूँ। 

आज फिर मैं आँसू को मोती बनाना चाहता हूँ।


...कमल पुंडी़र