मेरी खामोशी ही मुझे आज भी बयान करती है, मेरी हर ग़ज़ल मुझे एक दास्तान करती है।   ये जात पात की बेड़िया है अब भी हमारे पैरो में, वरना मोहब्बत तो इंसान को इंसान करती है।   मेरी नुमाईंदगी ही किसी कमजोर ने की थी शायद, वरना ऐसी चाहत तो खुद को भगवान करती है।   मुकम्मल इश्क़ ही दे हर बार चोट ये जरूरी तो नही, अधूरी मोहब्बत भी अनदेखे जख्मो के निसान करती है।   सरहदे बनाई है दिलो में इन ही सियासतगर्दो ने, वरना इंसानियत तो एक होने का फरमान करती है।   दो गज जमीन और एक कफन ही तो चाहिए ओढ़ने को, ये मौत ही तो सबकी जिंदगी आसान करती है।   मैंने अमीरो को गरीब की खुद्दारी की मिसाल देते सुना है, और यही गरीबी गरीब का हर दिन रमजान करती है।   अधूरे है पर मैंने पाले है कुछ ख्वाब तुम भी पाल लो मिया, मैंने सुना है तन्हाई जेहन को समसान करती है।   बड़े नाजो से पाला है तुझे "गुस्ताख़ शायर" संभाल कर रखना अक्सर माँ बाप की दुआ ही लोगो को महान करती है।