जो लिखूँ मै किताब कभी बैठकर

तो सोचूँ कि क्या लिखूँ चुनकर

ख्वाहिशे भी बहुत है मेरी और पूरी भी होंगी कभी

डर है नजर ना लग जाये ख्वाहिशो कि बुरी।

जो लिखूँ मै किताब कभी बैठकर

तो सोचूँ कि क्या लिखूँ चुनकर

रोज सोचूँ कि आज खत्म करूँगी अपनी किताब का का एक पन्ना लेकिन दिल है कि आगे बढ़ने को गवारा ही नही।

कभी याद आये उसकी मुस्कुराहट तो कभी याद आये उसकी चिल्लाहट कभी सोचूँ मै कि हम ही है इस पूरे जहाँन मे जिसे मिला है हमसफर तेरे जैसा

फिर देखूँ हम ही नही पूरी दुनियाँ मे जिसने इश्क फरमाया है वो तो पूरा जमाना है कोई इससे कहाँ बच पाया है।

सुना है रिश्तो मे समय के साथ मिठास खत्म हो जाती है

लेकिन हमने तो अपने रिश्ते मे प्यार का गहरा रंग पाया है।

जो लिखूँ मै किताब कभी बैठकर

तो सोचूँ क्या लिखूँ चुनकर


काजल तिवारी