माना मुहब्बत से परहेज तुमको ||
जरा उस मशिनरी को अजमा के देखो ||
विधाता ने सृष्टि जहां से रची है ||
नदी अप्सरा की नहा करके देखो ||
बसेगी गृहस्थी काटेंगे सही दिन ||
खुशियों का दीपक जला करके देखो ||
मंगल भी होगा हँसेगी जवानी ||
अखाड़े में दंगल लड़ा करके देखो ||
वंशज बढ़ेगा भी पुरखे तरेगे ||
बस एक बार टांका भिड़ा करके देखो ||
शरम की खड़ी बीच में जो दीवारे ||
दिवारो को अब तो ढहा करके देखो ||


