यूँ ना रुख मोड़ रुख़सार का तूँ।
अभी तो जुल्फ़े भीगी-भीगी है।।
यूँ ना तोड़ सांसों को नब्जों से तूँ।
अभी तो हवाएँ रुकी-रुकी है।।
ऐ जिन्दगी यूँ ना रूठ मुझसे तूँ।
अभी तो जमाना खफ़ा-खफ़ा है।।


यूँ ना रुख मोड़ रुख़सार का तूँ।
अभी तो जुल्फ़े भीगी-भीगी है।।
यूँ ना तोड़ सांसों को नब्जों से तूँ।
अभी तो हवाएँ रुकी-रुकी है।।
ऐ जिन्दगी यूँ ना रूठ मुझसे तूँ।
अभी तो जमाना खफ़ा-खफ़ा है।।