दुनिया किस भी नज़र से देखे
मैंने पिता के चेहरे की झुर्रियाँ देखीं
देखा टूटे सपनों के टुकड़े जोड़कर
सब कुछ सहेजते
हाँ पैर में जूते
हाथ में घड़ी
गले में मोटी सोने की सिकड़ी नहीं थी
लेकिन फिर ये था
इन सब को करने के लिये
बिका ईमान और ज़मीर गिरवी नहीं थी
किसी कागज़ पर दस्तखत करने के लिये
ली कभी रिश्वत नहीं थी
हिस्से में क्या मिला?
से ज्यादा हिस्सेदारी में नीयत खोटी नहीं थी
सीखा क्या, सीखाया क्या?
इसमें कोई कमी नहीं की
देशी बोली बोलते हैं
लेकिन विदेशी की बेइज़्ज़ती नहीं की
बड़े घर की बेटी
घर की सबसे बड़ी बेटी नहीं थी
घर बड़ा नहीं पिता की सीख बड़ी थी
Kadambari Kishore


