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वेहशीयत


उसका दामन दाग़दार था, या जिस्म किसे गर्ज,ठहरे गुमां-ए-मर्द, फरोशा-ए-जिस्म की किसे तलाश है,

फिर भी इक रोज़ तरमीम जो करने बैठे उसकी रूह की,मर्द होने का गुरूर, सारी शक्सीयत, सारा वजूद ही दागदार हो गया.

— ©Kaiz
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