कदम बचा कर चलने लगा हूं, के फिर कोई ऐसा काम न हो जाए,
औरों से भी अब कम मिलता हूं, के दिल खोल दिया तो बदनाम ना हो जाए,
दिन भर तो खुदको उलझाए रखता हूं, दुआ करता हूं कन्हीं शाम ना हो जाए,
के दिन ढलते ही तेरी यादों की गिरफ्त मे, कन्हीं मेरा सब कुछ तमाम ना हो जाए.
©KAIZ

