फाकता था होंसला जो इन पंखों पर आसमां चीरने का,कूच उसकी देहलीज तक की भी न कर सके,बेड़ी-ए-ज़ेहेन में खुदही को कर लिया कैद,ना किसी और के दिल तक पोहचे, ना अपने घर को आ सके.
फाकता था होंसला जो इन पंखों पर आसमां चीरने का,कूच उसकी देहलीज तक की भी न कर सके,
बेड़ी-ए-ज़ेहेन में खुदही को कर लिया कैद,ना किसी और के दिल तक पोहचे, ना अपने घर को आ सके.