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पंख


फाकता था होंसला जो इन पंखों पर आसमां चीरने का,कूच उसकी देहलीज तक की भी न कर सके,

बेड़ी-ए-ज़ेहेन में खुदही को कर लिया कैद,ना किसी और के दिल तक पोहचे, ना अपने घर को आ सके.

— ©Kaiz
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