और फिर इक रोज़ मैं घर आते आते रास्ता भटक गया,
मानो गम बैठा था तैयार, मेरे सीने से आके लिपट गया,
एक मै हूं बिछड़ कर भी उसी पर मरता गया,
एक वो है जो वक्त देख कर बदल गया,
©Kaiz


और फिर इक रोज़ मैं घर आते आते रास्ता भटक गया,
मानो गम बैठा था तैयार, मेरे सीने से आके लिपट गया,
एक मै हूं बिछड़ कर भी उसी पर मरता गया,
एक वो है जो वक्त देख कर बदल गया,
©Kaiz