ऐ ज़िन्दगी ! इस ज़िन्दगी को कितना सताओगी,

समय की मार क्या कम थी ? जो अब तुम भी डराओगी।


बहुत जी लिये रात अंधेरी,अब अंधेरा छटने दो

रोज़ मर कर रोज़ जीने का यह सिलसिला अब थमने दो ।


माना कि तुम लोगों को तजुर्बे बहुत दे जाओगी,

पर इसका मुझको यकीन है,तुम एक दिन फिर मुस्कुराओगी।


कामिनी मिश्रा