अभी आँखें ना खोलूगी कि तुम सपनों मे आये हो ।

दिवानी थी तुम्हारी ही मगर अब और भाये हो ।


मेरी आँखों को जाने क्यों आज कल कुछ नही भाता

मैं लिखती हूँ गज़ल कोई नाम तेरा ही लिख जाता।


मैं अपने आप मे गुम थी वहाँ भी तुम ही आये हो ।

दिवानी थी तुम्हारी ही मगर अब और भाये हो।


तुम्हें पा कर मेरे दिल की कोई हसरत ना बाकी है ,

तुम्हारा साथ है जीवन मे बस इतना ही काफ़ी है।


बड़े मसरूफ़ रहते हो मगर फुर्सत से आये हो।

दिवानी थी तुम्हारी ही मगर अब और भाये हो।


मैं कुछ ना थी बिना तेरे मेरी पहचान है तुमसे,

इन आँखों की चमक तुम हो मेरी ये शान है तुमसे ।


मेरी इस ज़िन्दगी मे तुम बड़ी किस्मत से आये हो।

दिवानी थी तुम्हारी ही मगर अब और भाये हो।


अभी आँखे ना खोलेगी कि तुम सपनो मे आये हो।