यह प्रणय जब से होने लगा है प्रखर,
हो गयी है कलम तब से खुद ही मुखर।
तुम को लिखने लगी,गुनगुनाने लगी,
अब तो होने लगी नित नयी एक प्रहर।
यह खयालात मेरे बदलने लगे,
आप बन कर मोहब्बत पनपने लगे।
ढूंढती तुमको हर पल हमारी नज़र,
बिन तुम्हारे नही अब हमारा बसर।
प्रेम के गीत लिखने लगी इस कदर,
तुमको महसूस करने लगी हर गज़ल।
क्या से क्या हो गया मैं भी थी बेखबर,
बन गये आप मेरी गज़ल के बहर।
इन लबों पर थी बातें जो कुछ अनकही,
उनको शब्दों मे अपने पिरोती रही।
भाव पन्नो पर मोती से जाते बिखर,
तुमको लिख कर कलम मेरी जाती निखर।
कामिनी मिश्रा
