तेरे घर की चार दिवाली मे रातरानी सी महकती मैं।


घर के कोने कोने मे बन कोयल सी चहकती मैं।


झुमके, कंगन ,बिन्दी, लाली सिर्फ इनसे कहाँ संवरती मै ?


तुम जब जब भर नज़र देखो,उतनी ही और निखरती मैं।


कामिनी मिश्रा