तुम्हारा ज़िक्र ना हो तो मेरी नज़्में अधूरी हैं,
मुकम्मल हो सके ना दिन हुई रातें ना पूरी हैं।
मै अपने गीत गज़लों मे ,तुम्हें ही गुनगुनाती हूँ।
याद तुम जब भी आते हो, कलम फिर से उठाती हूँ।
कोई पैगाम तेरे नाम ,लिखना भी ज़रूरी है।
तुम्हारा ज़िक्र ना हो तो मेरी नज़्में अधूरी हैं।
समझाया बहुत दिल को ,कि यूं चाहे नही तुमको ।
ना जाने कब हुआ तेरा, खबर भी ना हुई हमको।
लो आखिर बंध गयी तुमसे,हमारे मन की डोरी है।
तुम्हारा ज़िक्र ना हो तो मेरी नज़्में अधूरी हैं।
कामिनी मिश्रा


