आज मेरे मन का, मेरे मन से ही द्वन्द है।तुम्हारे मेरे प्यार का,ये कैसा अनुबन्द है।क्यों तुम पढ़ ना सके,मेरे मन की किताब को ?इसके हर पन्ने पर लिखा,बस प्रेम का ही छन्द है ।कामिनी मिश्रा
आज मेरे मन का, मेरे मन से ही द्वन्द है।
तुम्हारे मेरे प्यार का,ये कैसा अनुबन्द है।
क्यों तुम पढ़ ना सके,मेरे मन की किताब को ?
इसके हर पन्ने पर लिखा,बस प्रेम का ही छन्द है ।
कामिनी मिश्रा