साथ तुम्हारे बैठे बैठे जाने कब खो जाती हूँ।

पंख लगा कर संग तुम्हारे,अंबर मे उड़ जाती हूँ।

प्यार तुम्हारा उपवन सा है,जीवन को महकाता है।

साथ तुम्हारा परछाई सा, हर पल साथ निभाता है।

नाम मेरा तुम जब लेते हो,कोई गज़ल हो जाती हूँ।

पंख लगा कर संग तुम्हारे,अंबर मे उड़ जाती हूँ।

तुम कोई शीतल तरूवर से,मै तेरी छाया सी हूँ।

कोई गहरे सागर से तुम,मै पावन गंगा सी हूँ।

जब तुम मुझको छू लेते हो ,और पुनीत हो जाती हूँ।

पंख लगा कर संग तुम्हारे,अंबर मे उड़ जाती हूँ।

प्रेम के ढाई अक्षर मे जब,मै तुम को ही पाती हूँ।

मन को जब तुम पढ़ लेते हो,प्रेमग्रंथ हो जाती हूँ।

जब जब तुम सुन्दर कहेते हो,कलियों सी खिल जाती हूँ।

पंख लगा कर संग तुम्हारे,अंबर मे उड़ जाती हूँ।

कामिनी मिश्रा