गिरा वृक्ष वो भीष्म धरा पर 

तब  सबका  राधेय  उठा 

रक्त पिपासू महाभारत में 

संशय कौरव दल का मिटा 


शपथ लिये वो मित्र मान की 

किंतु कवच किया है दान 

मृत्यु सत्य, निश्चित आयेगी 

उसे रहा दिनकर का भान 


माधव बैठे दिव्य रथों पर

किसी शस्त्र की नहीं दरकार 

पवनपुत्र सज रहे ध्वजा पर 

कर्ण डरे न किसी ललकार 


नहीं  शेष है कोई  सुरक्षा 

मिली देह है कवच समान 

अंतिम बूँद रक्त की जाये 

तब शर लेगा मित्र के प्राण 


वचन दिया है कुन्ती मात को 

संख्या  कम  ना  पाओगी 

मृत्यु वरे जो वीर कर्ण को 

पार्थ   मात  कहलाओगी