कुछ यूं होती है दहलीज़ घर की,
ना चाहते हुए भी पार करनी होती है।
फिर लिख दी जाती है किस्मत,
बांँधने के लिए वो चहारदीवारी होती है।
मर्यादा और समाज से जुड़कर,
संयम से बनी दीवार फिर एक होती है।
करते करते पार ये ही फासले,
फैसलों की दहलीज़ पर खड़ी होती है।
आसान नहीं होता घर छोड़ना,
क्यूंकि फिर से वो कहांँ नसीब होती है।
कुछ यूं होती है दहलीज़ घर की,
ना चाहते हुए भी पार करनी होती है,,,,
-©ज्योत्सना अरोड़ा
-©Jyotsana Arora


