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मज़दूर के पाव

इस शहर से उस शहर , भूख को पीता रहा

मैं तो ज़िंदा था कहा, मैं तो बस जीता रहा



दर्द क्या देते भला, पैरो के वो छाले मेरे

सीने में जो ज़ख्म था, मैं वही सीता रहा



प्यार से मिलता गया, हर राह का वो

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