हर बार तुम्हारी नफरत पे, मैं बात यही दोहराऊंगा

की इश्क़ हमारा मजहब है, मैं इसको ही फैलाऊंग


घुरोगे मेरी आँखों में, रख के बंदूक जो सीने पर

हल्के से पलके झपकाकर, मैं इश्क़ तुम्हे सिखलाऊंग


बार बार मजहब जाति, मुझसे तुम जो पूछोगे

नाम कहूंगा इश्क़ मेरा ,और इश्क़ जाति बतलाऊंगा


तुम बार बार कांटे लाकर, राहो में मेरे जो फेंकोगे

पर इश्क़ हमारा मकसद है, इसे मंज़िल तक पहुँचाऊँगा