
हर बार तुम्हारी नफरत पे, मैं बात यही दोहराऊंगा
की इश्क़ हमारा मजहब है, मैं इसको ही फैलाऊंग
घुरोगे मेरी आँखों में, रख के बंदूक जो सीने पर
हल्के से पलके झपकाकर, मैं इश्क़ तुम्हे सिखलाऊंग
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हर बार तुम्हारी नफरत पे, मैं बात यही दोहराऊंगा
की इश्क़ हमारा मजहब है, मैं इसको ही फैलाऊंग
घुरोगे मेरी आँखों में, रख के बंदूक जो सीने पर
हल्के से पलके झपकाकर, मैं इश्क़ तुम्हे सिखलाऊंग
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