जानी अनजानी राहों में इन पैरों ने चलना सीखा इन्ही बाहों में
जो कभी तो गोद में उठा कर लोरी सुनाती और कभी लरखरते हुए क़दमों को संभालती
हमेशा साथ देने का वादा करना और निभाना
अपने लिए भूल कर हमें बचपन की हर ख़ुशी दिलाना
याद करने बेठुं आज भी वो लम्हे, ख़ुशी से आंसू चलके और मन लगे ज़ोरो से धड़कने
कभी यह न सोचा की कैसा कर पाऊंगा इनकी चाहत पूरी, करते जाना बस करते ही जाना
आज वो बूढ़ी बाहें खोजें है सहारा और कहती मुझसे हर पल की जानी अनजानी राहों में इन पैरों ने चलना सीखा इन्ही बाहों में