आओ सुनाऊ एक कहानी एक जवान की ज़ुबानी

एक फौजी जो बिना डरे सिर्फ अपना फ़र्ज़ निबाहता है लकिन कितनी कश्मकश चलती होगी उसके अंदर उसी को बायां करती यह कविता

 सोच में भी सोच से न हारूँ, चाहे कुछ भी हो जाये

निकला घर से कफ़न बाँध के, बिना सोचे अंजाम का की क्या हो जाये

ऐसा नहीं की घर की याद नहीं सताती

मगर देश की मिटटी मुझे बुलाये

 

रहता हूँ उस कश्मकश में बहुत बार, मगर उस मिटटी की खुशबू सब कुछ भुलाये

 माँ के हाथ का खाना याद तो बहुत आये पर इस धरती माँ के आगे कुछ नज़र न आये

हौसला रखना ही सीखा मैंने, क्यूंकि दुश्मन से लड़ना यही सिखाये

खुद से खुद को जीत कर, रखूं अपने अंदर की ज्वाला जलाये

 कभी उस गोली की आवाज़ में बच्चों की किलकारी ढूंढू

और कभी नींद की उस झपकी में अपनी संगनी का का अंचल ढूंढू

 एक दिन तो आएगा जब शहीद नाम दिया जायेगा, सीना गर्व से फूलेगा जब तिरंगा बदन से लिपटेगा

 कहूं हमेशा मैं खुद से यही की सोच में सोच से मैं न हारूँ कभी, चाहे कुछ भी हो जाये