मेरे कमरे के एक कोने में सितार रखी थी
जिसके तार हां टूट गए थे
मगर उसपर तुम्हारी
उंगलियों के निशान मुझे साफ़ दिखते थे
वहीं बगल में मेरी एक तस्वीर थी
बहुत पुरानी तस्वीर
मैं बेशक भूल जाता था
उन उंगलियो के निशान को छूना
मगर तस्वीर मेरी बार बार गिरती थी उस ओर
तुम्हारे पास आने की ख्वाइश
अपने फ्रेम में दबाये
मेरे कुर्सी के दायीं ओर न
एक बरसों पुराना संदूक पड़ा था
बड़ा शौक था मुझे पुरानी यादों को
संजोने का....
देखने वाले कबाड़ कहते थे उसे
और चिढ़ कर एक दिन मैंने
ये इतनी लंबी चादर से ढक दिया था उसे
बायीं ओर किताबें आलमारी में
धूल फांका करती थी
मगर उसके अंदर से मेरी लिखी हुई किताब
हर वक़्त मनोबल बढ़ाती थी मेरा
ऊन के पुराने बुने झालर, पुराना मटका,
टोकरी, लाठी सब बड़े प्यार से
अपने कलेक्शन में नया ले कर आया था मैं
मैं तो बीते ज़माने की याद सहेज रहा था
उस वीरान से कमरे में
और लोग कहते थे मैंने
कमरे को कबाड़ घर बना दिया है....