तुम्हारे पास सम्मोहित कर देने वाला कोई
मंत्र है क्या?
मैंने अक्सर तुम्हारे आगे क्योंकि
पाया है खुद को खींचता हुआ
और जानती हो .....
दूरी का एहसास होने लगता है न
तो लगता है कि जैसे शराबी हूँ मैं
और तुम मय से भरा कोई जैसे रंगीन प्याला
जिसमें से अपना हिस्सा मैं
ढूंढने लगता हूँ तुम्हारी आँखों
में अपनी आंखें डाल कर
और तुम्हारे बिना
विचलित हो जाता हूँ
चिड़चिड़ा....बैचेन....पगलाया हुआ
हक़ तो देखो जानता हूँ की इतना नहीं
की रोक लूँ तुमको आज पास अपने
और सपनों के चादर में तुम्हारी
बातों के धागे से तुरपाई करता रहूं..
देखता रहूं ये मंद सी सहज मुस्कान
और बिठा कर यूँ अपने सामने
करता रहूं ताउम्र को मदिरापान