उम्मीद


हंसकर जहां कहता है मुझसे,

 छोड़ दे दामन उम्मीद का 

उम्मीदें भी भला पूरी होती है ?

मैं ख़ामोश सी खड़ी झुंझला उठती हूं ,

तभी कहीं से एक सदा सी आती है...

 मैं अपनी ही कैफ़ियत पर, मुस्कुराने लगती हूं ।

और ख़ुदकलामी के आलम में, लब जुंबिश करते हैं- 

'कह दे इस जहां-ने-फ़ानी से,   

  उम्मीद हौसला बख़्शती है,

 मेरी रूह हयात है ..बेदार है.. ज़मीर जगा हुआ है ..

और इसी उम्मीद के दोश पर सवार होकर,

 मैं नई दुनिया की सैर पर निकल पड़ती हूं ,

ढेरों आरजूएँ, उमंगे समेटकर ज़ुल्मते -शब में सहर देखती हूं,

 तूफ़ाँ में किनारा देखती हूं ।

फिर क्यों ज़माना सिल्वटों के मफ़हूम नहीं समझता? 

उम्मीद का दामन नहीं पकड़ता?

 उम्मीद है कि यह उम्मीद भी बर आएगी ,

हर चेहरा नूर -ए - ख़ुदा से दमकेगा।

 आमीन आमीन करती हूं 

 आमीन आमीन करती हूं।