वो वक़्त कुछ और था ,

जब मैं शिकवा नहीं करती थी ,

और चुपचाप सब सह जाती थीं,

वह वक़्त तो गया मियां,

 वो ज़माना भी गया ,

 अब तो मैं शिकवा भी करती हूं,

 शिकायत भी करती हूं।

 क्योंकि मैंने अब सहना छोड़ दिया है

 मेरे हाथों ने अब जान लिया है ,

 कहां मुट्ठी बंद करना है ,

 और कहां खोल देना है ।

 प्रहार करना भी सीख लिया है ।

 मैं केवल अमला ही नहीं ,

 अब अमल भी हूं ।

 अमृत ही नहीं,

ज़हर भी हूँ।

  जुल्म करने से पहले ,

  अब ज़रा ख़्याल कर लेना,

  क्योंकि मैंने अब सहना छोड़ दिया है ।

  मैं जवाब देना भी जानती हूं ,

  और पलटवार करना भी,

  मैं जननी भी हूं 

  और महाकाली भी ,

  मैं दुर्गा भी हूँ,

  और अम्बिका भी।

मैं केवल बहती सरिता ही नहीं,

 हूं मैं गहरी सुनामी भी,

 हूं मैं गहरी सुनामी भी ।

 हां मैंने अब सहना छोड़ दिया है।