क्या यह ज़माना डर सिखाता है!

 व्यर्थ के चुनावों में उलझाता है!

  जाने क्या-क्या समझाता है!

  मिटाने की कोशिश करता है!

 झूठे नक़ाब से मन को छलता है ,

 मगर उस ख़ुदा के आगे सभी  बेपर्दा है ।

 वही बनाने वाला है ,

वही मिटाने वाला है , 

और जब बनाने वाला ही राह दिखाने लगे ,

 तो कौन डरता है ? 

 कौन उलझता है?

 कौन छलता है?

 सारे ज़माने के कायदे-नियम एक तरफ़ ,

और उसकी रज़ा एक तरफ।

 वही बनाता सभी को है...

 वो जो ठाने तो, 

 हर इंसान को मिटा दे।

 इक इशारे में,

 हर शय को बना दे ,

हर कली को महका दें।

उसने तो एक ही राह बनाई थी ,

जाने कहां हम इतनी राहों में भटक गए! 

 वही एक राह हमें भी बनाती है ,

 हौसले से चलाती है , 

 उमंगों से भर देती है ,

 यह हौसला-ए-क़लम कुछ और नहीं ,

 उसीकी रज़ा से उठा एक छोटा-सा हर्फ़ है।

 उसी का बनाया यह जहां है,

 उसी का बांधा यह समाँ है।

 मुझे भी वही बनाएगा...

 मुझे भी वही संवारेगा ...

 वही सृजन करवाएगा... 

 वही रचना लिखवाएगा... 

 वही इतिहास बनाएगा ...

 वही इतिहास बनाएगा...