क्या औरत को केवल,

उसका प्रेमी और पति ही छलता हैं?

क्या वहीं उसे दुख पहुंचाते हैं?

या इसके दोषी और भी हैं...

छली जाती हैं वो हर कदम पे,

दुख सहती हैं वो कई दफ़ा,

कभी पिता से,

कभी भाईयों से,

कभी पुत्रों से,

कभी सहपाठियों से,

कभी सहकर्मियों से,

कभी किसी और संबंध से,

छली जाती हैं वो हर रिश्ते से,

कोई बड़ी बात नहीं लगती,

आदत है औरतों को शिकायत करने की..

हर पुरूष से वो छली जाती हैं..

कभी प्रेम के नाम पे,

कभी कर्तव्य के नाम पे,

कभी आदर के नाम पे,

कभी सम्मान के नाम पे,

कभी शिष्टाचार के नाम पे,

कभी घर की शांति के नाम पे,

और वो चुपचाप सह लेती हैं,

दोष उसका है या उसके संस्कारों का?

क्या ऐसे संस्कारों की बेड़ियों को,

तोड़ देना सही नहीं हैं?

कभी तो न्याय होगा,

और वो सही कदम उठा पाएगी...

और तब वो हर बंधन तोड़ पाएगी...

हर छलावे से मुक्त हो जाएगी...