यूं बैठे कटती जिंदगी,

शुष्क विचारों में डूबा मन

सूर्योदय तक नींद की आंखें

धूप सेंकने भरा आंगन

मन को बहुत झिंझोड़ता है

अभी खाने का हो गया

अब आगे का पता नहीं

यह विचार जीवन को

सीमित जंजीरों में सिकोड़ता है

बैठे तो है हम पढ़ने को

किताबों में है मन नहीं

पूछ लें यदि कारण अगर

कहें उनमें तो फन नहीं

बस यही आनंदिच्छित मन

हाथ की लकीरों को तोड़ता है

भला हो तो हमारी मेहनत

बुरा हो तो फूटी किस्मत

बस यही किस्मत का खेल

किस्मत हमारी फोड़ता है