मैंने हर आग को नाम दिए
कभी घृणा कहा,
कभी ज़रूरत,
कभी हक़।
अहंकार मेरा आईना बना गया,
जिसमें बस
खुद को देखता रहा,
और बाकी सब
धुंधला पड़ता गया।
क्रोध हाथों तक आया,
लालच ने रास्ते चुने,
मोह ने सिखाया
जो मेरा है
वही सच है।
असंतोष ने
कभी ठहरने नहीं दिया।
सब कुछ जलता रहा,
पर आग को
कभी नाम नहीं मिला।
लोग राख देखते रहे,
सवाल करते रहे,
उसे वजह मानते रहे।
मैं भी
कुछ देर
उसी राख को देखता रहा
जलन महसूस हुई,
पर समझ
अभी अधूरी थी।
क्योंकि उस वक़्त जो हाथ था,
राख थी..
और आग
अभी भी
ज़िंदा थी।

