एक जगह है
जहाँ दीवारें समय पर खड़ी मिलती हैं,
छत मौसम निभाती है,
और ताले
अपना फ़र्ज़ ईमानदारी से करते हैं।
वहाँ दिन कट जाते हैं,
रातें बीत जाती हैं,
और सन्नाटा
कभी सवाल नहीं करता।
फिर एक जगह और है—
जहाँ वाक्य अधूरे रह जाते हैं,
आँखें ज़्यादा बोलती हैं,
और चुप्पी भी
समझ ली जाती है।
वहाँ गिरना
कमज़ोरी नहीं होता,
और टूटना
छुपाने की चीज़ नहीं।
मैंने सीखा—
चार दीवारें
सिर्फ़ खड़े रहने का कारण देती हैं,
पर जो साथ खड़े रह जाएँ
जब भीतर कुछ टूटे,
वही तो
परिवार कहलाते हैं।

