किसी ने मुझसे पूछ लिया
क्या है कृष्ण कहाँ है श्याम।
दर-दर ढूँढा घर-घर देखा
हर कण देखा, हर इक धाम।
आँखें खोल जग सारा देखा
रूप अनेक संसार विशाल।
पर बाहर खोजा जो मैंने
कृष्ण न आया दृष्टि-पाल।
फिर आँखें मूँदी ध्यान लगाया
हृदय में श्वासों को थामा।
नाम लिया जब प्रेम सहित
हर कण बोला राधे-श्यामा।
मुझमें दिखा तुझमें दिखा
क्षण-क्षण उसका रूप समाया।
जो बाहर ढूँढा व्यर्थ गया
वो भीतर आकर स्वयं दिखाया।
ऐसा है मेरा कृष्ण सखा
ना सीमा ना कोई आकार।
हर पल, हर कण, हर श्वास में
है वही बसे, है वही आधार।

