पर्वत झुके, या मैंने खुद को तोड़ा,
नदियों को चीरा, या समय को मोड़ा।
मंजिल एक छलावा, जो मन ने रचा,
शिखर पर ठहरा, पर सच कहीं बचा।

क्या जरूरी था, खुद को भूल जाना?
अपनों से दूर, मन को सूना कर जाना?
थमकर सुनता, जो दिल की बात थी,
प्रेम बाँटता, जो जीवन की सौगात थी।

शिखर पर अब, प्रश्न बनते हैं साये,
क्या पाया, जब सब कुछ है माये?
जीवन एक धारा, मंजिल बस भ्रम,
खुद में लौटना, है चिर सत्य का क्षण।