ख़ुद से ख़ुद की लड़ाई है,
हर मोड़ पे तन्हाई है।
कुछ खोया, कुछ पाया मैंने,
जाने कैसी ये रिहाई है।
जो होना था, वो हो गया,
जो बीता, सो बीत गया।
अब रोना फिर किस बात का,
बुरा था समय... वो भी कट गया।
पर अब रुकना मुझे मंज़ूर नहीं,
ना झुकना मुझे मंज़ूर है।
बिगुल बज चुका है युद्ध का,
अब ख़ुद से पीछे हटना मंज़ूर नहीं।
