सियासी माचिस की तिलियाँ बने    सब इनकी डिब्बियों से कैसे निकलोगेअब? जब भी निकलोगे सिर के बल घिसेगी,रगङेगी जल-जल उठोगे तब कोसोगे किसको? सवाल करोगे? अलग-अलग डिब्बियों में बांट दिये जाओगे  सदियाँ बीती कब तक इसकी चटकीली पैकेजिंग में आओगे? प्रचार के दम पर बाजार में ब्रांड बनता है,बिगङता है कब समझोगे? हर बार वादा करेगी किसी गरीब के चूल्हे का मगर चिंगारी से भूख सुलगाएगी अभी भी जो ना संभले जो डिब्बी में कैद करेगी तुम्हें खांचे में फिट करने लायक तिली बनाती जाएगी उछालेगी उंगलियों पर और कई हथेलियों को जला जाएगी....